मांगलिक दोष का भ्रम ?

भारत में जब भी किसी जातक या जातिका के विवाह का विचार मन में आता है तो सबसे पहले ये विचार मन में उठता है की जातक या जातिका मांगलिक दोषी तो नहीं ,अगर जातक या जातिका मांगलिक दोष युक्त पाए जाते है तो फिर परिवार के लोग उपाय वगेरह के बारें में सोच विचार शुरू करते हैं | माँ बाप या वो इंसान जो इस दोष से पीड़ित है उनकी कोई गलती नहीं है | इस दोष के बारें में बहुत सारे भ्रम हैं जिनकी कोई ढंग से व्याख्या उपस्थित नहीं है की क्या बात क्या सिद्ध करती है और ये मांगलिक दोष जीवन में किस तरह से काम करता है , जिसकी वजह से वो लोग गलत रास्तों को साधने में विमर्श रहते है ||

मांगलिक दोष का अर्थ है की मंगल का जन्म पत्रिका में एक विशेष स्थान पर स्तिथ होना जो की जातक या जातिका की वैवाहिक जीवन को प्रभावित करता है, ये स्थान हैं १-४-७-८-१२ भाव जन्म लग्न से ( यदि मंगल इन स्थानों पर उच्च राशी या नीच राशि का होगा तो उस जातक या जातिका को मांगलिक दोष युक्त नहीं माना जाएगा | इसकी उच्च राशि है मकर १० नम्बर और नीच राशि है कर्क ४ नम्बर | ) इस दोष का आकलन जन्म लग्न; चन्द्र लग्न; शुक्र लग्न व गुरु लग्न से देखा जाता है |

इन चार तरह से आकलन करने का कारण ये है :

१. जन्म लग्न जातक की पूर्ण जीवन को दर्शाता है |और

२. चन्द्र लग्न जातक के मानसिक सोच को दर्शाता है (ये बहुत ही महत्वपूर्ण अंग मन जाता है मांगलिक दोष का आकलन करने के लिए) |

३. शुक्र लग्न से क्यूंकि शुक्र वैवाहिक जीवन का कारक है और ये जातक व जातिका के अंत रंग पलों को दर्शाता है अथवा ये पत्नी का भी कारक है पुरुष जातक के लिए

४. गुरु लग्न से क्यूंकि गुरु जीवन में सुख व समृधि का कारक है अथवा ये पति कारक है स्त्री जातिका के लिए |

( शुक्र और गुरु ये दोनों बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रह हैं जिनको स्त्री और पुरुष दोनों की जन्म पत्रिका में ध्यान से आकलन करना चाहिए क्यूंकि विवाह मिलान करने के लिए ये बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं | अगर मांगलिक दोष युक्त मंगल को गुरु या शुक्र की दृष्टी मिलती है, तो जातक का मांगलिक दोष कुछ हद तक कम हो जाता है परन्तु इसमें महत्वपूर्ण बात देखने वाली ये है की शुक्र शनि की राशियां कुम्भ या मकर में ना हों और ना ही इसके वर्गास में हो अन्यथा जातक या जातिका के वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आ जायेगी | )

आप ये जान कर अचंभित हो जाएंगे की ७० प्रतिशत से भी ऊपर की जनता मंगल से प्रभावित है, तो क्या सबको मंगल का बुरा प्रभाव झेलना पड़ता है | हम सब किसी न किसी परिस्थितियों में रहते ही हैं, परन्तु उसका मूल कारण मंगल नहीं है, बहुत सी ग्रहों की परिस्तिथियां हैं जिनका गणितग्य आकलन हमें जातक के लिए करना चाहिए |

मांगलिक दोष को बहुत ही खतरनाक माना गया है परन्तु इससे डरने से पहले मंगल को अथवा इन भावों को जन्म पत्रिका में समझना ठीक रहेगा | मंगल का अर्थ है हिम्मत, क्रोध, किसी भी परिस्थिति में लड़ने के क्षमता, सहन सीलता, असभ्य इच्छाएं और अप्राकृतिक इच्छाएं | इन भावों का अर्थ है:

१ भाव – जातक की पूर्ण जिंदगी |

४ भाव – जातक की सोच धारा, शयन सुख |

७ भाव – जीवन साथी |

८ भाव – काम क्रिया भाव व वैवाहिक जीवन की पूर्णता |

व १२ भाव – काम क्रिया का आपसी सम्बन्ध, काम सुख |

(यहाँ पर ये जानकारी देना आवश्यक है की विवाह मिलन के लिए ये भाव बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण प्रभाव रखते हैं )

यदि मंगल ग्रह इन भावों बैठते है, तो इन भावों में उत्तेजना, बैचेनी व तीव्रता पैदा करते हैं |

प्रथम भाव में बैठ कर मंगल ग्रह ४-७-८ भाव को देखते हैं;

चौथे भाव में बैठ कर ७-१०-११ भाव को देखते हैं;

सप्तम भाव में बैठ कर १०-१-२ भाव को देखते हैं;

आठवें भाव में बैठ कर ११-२-३ भाव को देखते है;

व १२ भाव में बैठ कर ३-६-७ भाव को देखते हैं |

मंगल के हर स्थान में जहाँ वो बैठा है अथवा जहां देख रहा है, उन सभी भावों को प्रभावित कर रहा है | इन सब परिस्थितियों में एक या दो भावों को, जो की विवाह मिलान के लिए आवश्यक है, वो मंगल से दूषित हो रहे हैं | ये सब मिलाकर विवाह के मूल्य सुख को खतरे में डाल देते हैं; जैसे काम पिपासा ज्यादा हो जाती है; हाथा-पाई पर आ जाना अगर सेक्स के मांग पूरी ना हो; शारीरिक काम क्रिया में अमर्यादित इच्छाएं रखना; अनेतिक तरह से जीवन गुजारना; हिंसा पूर्ण व्यवहार रखना; प्रचंड स्वरूप रखना |

यही एक मुल्की कारण है, जिसके वजह से ज्योतिषी ये सुझाव देतें हैं की एक मांगलिक का विवाह दुसरे मांगलिक से ही होना चाहिए, ताकि वह एक दुसरे को सही ढंग से समझ सकें और वैवाहिक जीवन पर भी कोई कष्ट व आंच ना आये |

फिर भी बहुत से वैवाहिक जीवन कष्टों से गुजरते है | परन्तु किस कारण से ..? अगर दोनों जातक मांगलिक हैं और आपस में विवाह करते हैं, तो वो कष्ट में क्यूँ, उनको तो सुखमय जीवन व्यतीत करना चाहिए, परन्तु वास्तव में ये सुख वो लोग भोग नहीं पा रहे |

बहुत से ज्योतिष ग्रंथों में विद्य्वानो ने ये उल्लेख किया है की शनि – सूर्य – राहू – केतु व मंगल क्रूर ग्रह माने गए हैं | अब यहाँ एक उचित प्रश्न आता है, की क्या मंगल इन सब में ज्यादा क्रूर ग्रह है ??? इसका जवाब है, नहीं | इन सब ग्रहों का बुरा प्रभाव होता है, इनका किसी भी तरह का सम्बन्ध उपरोक्त किसी भी भाव या ग्रह से होने पर जातक के लिए परेशानी का सबब बन जाता है | यहाँ हम वैवाहिक जीवन के बारें में विचार विमर्श कर रहे हैं और उन सभी भावों को भी जो की सुखमय वैवाहिक जीवन व्यतीत करने के लिए आवश्यक है | यह सारे ग्रह विवाहिक जीवन में अप्रिय घटनाओ के कारक हैं, इनका जितना ज्यादा सम्बन्ध होगा, उतना ही दुष्कर प्रभाव वैवाहिक जीवन पर पड़ेगा |

एक ज्योतिषी या उस इंसान को जिसको इस विद्या की समझ है, उसको जातक की जन्म पत्रिका में उपरोक्त बताये हुए क्रूर ग्रहों को – प्रथम भाव – सप्तम भाव का गणित द्वारा आकलन करना चाहिए | परन्तु सबसे विशेष विचार जातक की जन्म पत्रिका में सप्तम भाव को; जातक की चन्द्र लग्न से सप्तम भाव को; शुक्र ग्रह को (पुरुष जातक के लिए) और गुरु ग्रह को (स्त्री जातक के लिए) गणना करनी चाहिए |

जातक व जातिका की जन्म पत्रिका में सप्तम भाव – सप्तम भाव का स्वामी (चन्द्र लग्न व जन्म लग्न दोनों से) – कारक ग्रह शुक्र व गुरु, अगर बुरे अर्थात क्रूर पापी ग्रहों से प्रभावित है, तो विवाहिक जीवन में परेशानियां आएँगी ही | इन परेशानियों और कष्टों की मात्रा इस बात से सम्बन्ध रखती है की सप्तम भाव का – उसके स्वामी का – उसके करक ग्रह का, क्रूर व पापी ग्रहों से कितना व कैसा सम्बन्ध है |

मुझको ये पता है की ये उचित उत्तर नहीं है, जो की आप इस उल्लेख में खोज रहे हैं | पर मुझको यह बताना जरुरी था, क्यूंकि ये समझना भी जरुरी है की मंगल ही अकेला ऐसा ग्रह नहीं है, जो की वैवाहिक जीवन में सारे लाष्टों का कारण बने ,बहुत सी अलग बातें भी है जिनको समझना जरुरी है |

परन्तु फिर भी मेरा प्रश्न वही है की सिर्फ मंगल ग्रह ही क्यूँ और बाकी किसी ग्रहों को इतना महत्वपूर्ण स्थान “योग” का क्यूँ नहीं दिया गया | मैंने ये प्रश्न अपने गुरु जी से पूछा,  जिसके उत्तर में उन्होंने कहा की

प्रथम, मंगल किसी भी जातक की शारीरिक क्षमता का कारक है, और व इसी के कारण जातक को अंदरूनी हिम्मत, ताकत व व्यवहार को समझने में मदद करती है |

दूसरा, उन्होंने ये भी कहा की मंगल की स्तिथि का आकलन करने से जातक की काम क्रिया सम्बन्धी इच्छा व ताकत का भी अंदाजा लगता है | जन्म लग्न से जातक की शारीरिक क्षमता और चन्द्र लग्न से जातक की मानसिक क्षमता का पता लगता है |

तीसरा और आखिर में उन्होंने ये कहा की इन सबको वैवाहिक सम्बन्धित भावों से मिला कर वैवाहिक जोड़े का बंधन का आकलन किया जाता है |

निष्कर्ष ये रहा की, मांगलिक होना कोई अभिश्राप नहीं है, पूर्ण तरह से इसकी जानकारी को विचार विमर्श करके एक जातक इस दोष के भ्रम से बाहर आ सकता है, जरुरत है सिर्फ समझने की |||